Skip to main content

माना ज़िन्दगी के रास्ते अलग थे बहोत


जाना...

माना ज़िन्दगी के रास्ते अलग थे बहोत,
लेकिन मुझे कोनसा सफर अकेले करना था...
में तो चल दिया था साथ तुम्हारे,
और चलता रहा उस वक़्त भी जिस वक़्त में मुझे रुकना था,
मंज़िलो की कहाँ कोई खबर थी मुझे,
कहाँ ध्यान रहा कोई रास्ता,
सब कुछ तो खो चुका था मैं,
बस यार एक तू ही तो मेरे पास था,
ज़िन्दगी से शिकायतें होती थी,
तो में तुझे बहाने बना लेता था,
हां थोड़ा ही सही मगर,
कभी कभी तो मुस्कुरा लेता था,
इश्क़ कहते कहते,
खुद तुम्हारे मतलब बदलते चले गए,
में तुम्हारी आँखों में ही उलझा रहा,
और तुम्हारे सपने बदलते चले गए,
हां ज़िन्दगी में अभी ठहराओ थे बहोत,
लेकिन मुझे कोनसा इस सफर में अकेला रुकना था,

जाना...

माना ज़िन्दगी के रास्ते अलग थे बहोत,
लेकिन मुझे कोनसा सफर अकेले करना था...

Comments

Popular posts from this blog

लड़के भी हारते हैं इश्क़ में

लड़के भी हारते हैं इश्क़ में, खो देते हैं अपना एक हिस्सा हमेशा के लिए रोते हैं बिलखते हैं, चीख़ते हैं बंद लबों से  दम तोड़ देते हैं अपना, किसी की याद में दाढ़ी बढ़ाकर छुपा लेते हैं, अपने चेहरे का ग़म लगाते हैं बिना फ़िल्टर की डीपी और दिखाते हैं सच को ज्यों का त्यों गुज़ार देते हैं महीनों एक ही जीन्स में पौंछना भूल जाते हैं अपने जूतों को अमूमन सूखते हैं इनके भी आँसू गाल पर ही बिता देते हैं कई कई दिन, बिना देखे चेहरा अपना रातों की नींद रहती है बाक़ी मुँह रखकर सो जाते हैं मेज पर  काली सी आँखों में लिए चलते हैं कुछ मरे हुए ख़्वाब और कहलाते हैं आवारा निठल्ला बेकार  अपनी गाड़ी को दौड़ाते हैं सुनसान इलाक़ों में दूर कहीं अनजान रास्तों में भूल जाते हैं अक्सर कहाँ जाना हैं खाते हैं चोट अपनों से, अज़ीज़ लोगों से सुनते हैं ताने टूटते हैं बिना शोर किए, चुपचाप किसी कोने में  भीतर ही भीतर बिना शिकायत किए दफ़्न कर देते हैं अपने जज़्बातों को  पसीने से बनाते हैं क्लिंजर अपना साफ़ करते हैं पेट्रियार्की का धब्बा भूल जाते हैं ख़ुद को सबकी ख़ुशी के लिए और अंत में  ख़...

वायरस

शायद कुछ ज्यादा बाहर निकल गए थे हम, शायद कुछ ज्यादा बाहर निकल गए थे हम यही वजह थी के लौट को घर को जाना पड़ा हमारी जान इस इकॉनमी से कई गुना ज़्यादा जरूरी है अफसोस के ये समझाने के लिए एक वायरस को आना पड़ा हम ग़ैर जरूरी मुद्दों में उलझे थे शायद इसीलिए कुदरत को हमे ये आईना दिखाना पड़ा अस्पताल मजहबी लड़ाइयों से ज्यादा जरूरी मुद्दा है अफसोस हमें ये समजाने के लिए एक वायरस को आना पड़ा कोई ऐसा भी मर्ज है कहीं के जिसकी कोई दवा नहीं, कोई ऐसा भी मर्ज है कहीं के जिसकी कोई दवा नहीं, तौबा इसके आगे तो इश्क़ को भी मुह छुपाना पड़ा जंग आपस में नहीं होती आफत से होती है अफसोस हमे ये समजाने के लिए एक वायरस को आना पड़ा हमने तो हथियार बनाये, मैदान ऐ जंग तैयार किये, ये तो इस दफा हमे मजबूरन साथ निभाना पड़ा  जान जाए भले किसी भी मुल्क में तो दर्द होता है सबको, अफसोस के हमे ये समझाने के लिए एक वायरस को आना पड़ा... अफसोस के हमे ये समझाने के लिए एक वायरस को आना पड़ा...

Dear Nature...

Dear Nature ये एक अपोलोजी लेटर है... में जानता हूँ मैंने इसे लिखने में उतनी ही देर कर दी है जितना आपको बचाने में... मैंने सुना है एक चिड़ियाँ जब घर लौटी तो कटी हुई डालियों के बीच अपने घोंसले को बिखरा हुआ पाके रो बैठी ये उसका तीसरा घर था ना वैसे हमे इस बात से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा है, आखिर वो इन्सान नई है ना... कहते है अगर कोई जुर्म करते वक़्त अपनी छवि देख लो तो गिल्ट के मारे वो कर नहीं पाओगे, नदियाँ अब साफ रही नही तो उसमें खुद की छवि दिखती भी नहीं, इसलिए हमने खुद को अपराधी मानना भी छोड़ दिया है... यह बीज बोई मिट्टी पे कॉन्क्रेट के रास्ते बनाके ना जाने हम कहाँ जा रहे है, शायद अपने अंत की और जिसे हम प्रगति की शुरुआत समज बैठे है, ऐसा नहीं है कि हमने कोशिश नहीं कि, हमने आवाज़ बहोत उठायी, फिर जवाब में ये हल सुनाया गया के जितने पेड़ कट रहे है उतने ही पौधे लगाए भी जाएंगे, ये सुनके ज़्यादातर लोग मान गए वो समझे ही नही के पौधों को पेड़ बन ने में  जितना वक़्त लगेगा शायद उतना ही वक़्त बाकी है हमारे पास... ज़रसल हमे कुछ और ज़मीन चाहिए, अपने घरों के लिए जिसमे बहोत सारे लकड़ो के दर...